
रायपुर,न्यूज़ धमाका :- दो साल तक कोरोना काल में विवाह समारोह में मात्र 20 लोगों को शामिल होने की अनुमति थी, इसके चलते सादगी से विवाह संपन्न हो रहे थे। अब नियमों की बंदिशें समाप्त हो जाने से विवाह समारोहों में धूम मचने लगी है। मंगलवार को महामुहूर्त माने जाने वाले अक्षय तृतीया पर राजधानी में 200 से अधिक जोड़े परिणय सूत्र में बंधेंगे। सड़कों पर बरात भी निकलेगी और भव्य रिसेप्शन समारोह भी होंगे।
महामुहूर्त में मांगलिक कार्य किए जाने की मान्यता होने से घर-घर में गुड्डा-गुड़िया का ब्याह रचाने की परंपरा भी निभाई जाएगी।तीन योग का संयोगज्योतिषाचार्य डा. दत्तात्रेय होस्केरे के अनुसार तीन मई को अक्षय तृतीया पर तीन योगों का संयोग है। इस बार शुक्र अपनी उच्च की राशि मीन में रहकर मालव्य राजयोग का निर्माण कर रहा है। साथ ही गुरु के मीन राशि में होने से हंस राजयोग और शनि के अपने घर में होने से शश राजयोग बन रहा है।
हिंदू संवत्सर में तीन तिथियों को महामुहूर्त-अबूझ मुहूर्त माना जाता है। इनमें वसंत पंचमी, अक्षय तृतीया और देवउठनी एकादशी शामिल हैं। कोई भी शुभ संस्कार इन तीनों मुहूर्त में किया जा सकता है, पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं होती। पूरे दिन शुभ संस्कार किए जा सकते हैं। खासकर मुंडन संस्कार, उपनयन संस्कार, विवाह संस्कार, गृह प्रवेश संस्कार, व्यवसाय प्रारंभ करना शुभदायी माना जाता है।
जैन धर्म में अक्षय तृतीया
श्री भारतवर्षीय दिगंबर जैन महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कैलाश रारा ने बताया कि प्रथम जैन तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ने दीक्षा के पश्चात प्रथम बार हस्तिनापुर के राजा श्रेयांश के हाथों से इक्षु रस का आहार ग्रहण किया था। उसी दिन से जैन धर्म में अक्षय तृतीया को दान पर्व के रूप में मनाया जाता है। मुनि दीक्षा के समय भगवान ऋषभदेव ने छह माह का उपवास का संकल्प लिया था। सात माह एवं नौ दिन तक किसी को आहार की विधि मालूम नहीं होने के कारण भगवान का पारणा संभव नहीं हो सका। इसी क्रम में एक बार विहार करते हुए भगवान ऋषभदेव हस्तिनापुर पहुंचे। वहां पर पूर्व भव में दिए गए आहार की विधि स्मरण हो जाने के कारण राजा श्रेयांश ने श्रद्धा भक्ति पूर्वक भगवान ऋषभदेव का इक्षु रस से आहार करवाया।
