
बिलासपुर न्यूज धमाका – छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में पश्चिम बंगाल के 12 मजदूरों ने याचिका दायर कर न्याय की गुहार लगाई है। इन मजदूरों को कोंडागांव पुलिस द्वारा बांग्लादेशी बताकर गिरफ्तार किया गया था, जबकि वे भारतीय नागरिक हैं। गिरफ्तारी, मारपीट, और अवैध हिरासत के खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट में एफआईआर रद्द करने और प्रति व्यक्ति ₹1 लाख मुआवजे की मांग की है।
क्या है मामला?
29 जून को पश्चिम बंगाल के कृष्णा नगर और मुर्शिदाबाद से 12 निर्माण श्रमिक, ठेकेदार के माध्यम से कोंडागांव जिले में स्कूल निर्माण कार्य के लिए आए थे। लेकिन 12 जुलाई को साइबर सेल थाना कोंडागांव की पुलिस ने उन्हें बिना स्पष्ट कारण बताए हिरासत में ले लिया।
पीड़ितों के अनुसार, पुलिस थाने में उनके साथ मारपीट, गाली-गलौज और मानसिक प्रताड़ना की गई। आधार कार्ड जैसी पहचान प्रस्तुत करने के बावजूद उन्हें बांग्लादेशी नागरिक करार देते हुए रात में जगदलपुर सेंट्रल जेल भेज दिया गया।
रिहाई, लेकिन रोज़गार छिन गया
13 जुलाई को पीड़ितों के परिजनों ने सांसद महुआ मोइत्रा से संपर्क किया। पश्चिम बंगाल पुलिस की ओर से भारतीय नागरिकता की पुष्टि की गई। इसके बाद 14 जुलाई को एसडीएम कोंडागांव के आदेश से उन्हें रिहा किया गया, लेकिन तब तक मजदूर अपना रोजगार और आत्मविश्वास दोनों खो चुके थे।
हाईकोर्ट में याचिका, सुरक्षा की भी मांग
अधिवक्ता सुदीप श्रीवास्तव और रजनी सोरेन द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि:
- उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द किया जाए।
- पुलिस द्वारा की गई मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना के एवज में प्रति व्यक्ति ₹1 लाख का मुआवजा दिया जाए।
- भविष्य में छत्तीसगढ़ में काम करने पर उन्हें सुरक्षा की गारंटी प्रदान की जाए।
कोर्ट का रुख
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बी.डी. गुरु की डिवीजन बेंच ने राज्य शासन को नोटिस जारी कर दो सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। याचिकाकर्ताओं को राज्य शासन के जवाब के एक सप्ताह के भीतर पुनः rejoinder प्रस्तुत करने का अवसर मिलेगा।
गंभीर सवाल
यह मामला नागरिक अधिकारों, पहचान की पुष्टि में लापरवाही और पुलिस प्रक्रिया में पारदर्शिता पर गहरे सवाल खड़े करता है। अगर ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह प्रशासनिक जवाबदेही और पुलिस सुधारों की ज़रूरत को उजागर करता है।
