
बिलासपुर न्यूज धमाका – हाई कोर्ट ने दुष्कर्म के एक गंभीर मामले में ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए आरोपी को दोषमुक्त कर दिया है। न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल की एकलपीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि पीड़िता एक शिक्षित, विवाहित और अधिकारी पद पर कार्यरत महिला है, जो अपने हित-अहित को भली-भांति समझने में सक्षम है। ऐसे में यह मान लेना मुश्किल है कि आरोपी ने जबरन शारीरिक संबंध बनाए होंगे या झूठे विवाह के वादे पर उसे धोखा दिया होगा।
क्या था मामला?
मूल मामला जांजगीर-चांपा जिले का है। पीड़िता, जो कि कृषि विभाग में कृषि विस्तार अधिकारी के पद पर कार्यरत थी, ने वर्ष 2018 में आरोपी अरविंद श्रीवास के खिलाफ दुष्कर्म का मामला दर्ज कराया था। उसने आरोप लगाया कि वर्ष 2017 में विवाह का झांसा देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए गए, जिससे वह गर्भवती हुई और बाद में गर्भपात कराना पड़ा।
इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(N) के तहत दोषी मानते हुए 10 साल के कठोर कारावास और ₹50,000 जुर्माने की सजा सुनाई थी।
हाई कोर्ट ने क्यों पलटा फैसला?
- कोर्ट ने कहा कि पीड़िता उस वक्त 29 वर्ष की थी, विवाहित थी, और किसी तलाक की पुष्टि नहीं थी।
- उसने आपसी सहमति से संबंध बनाए थे, और गर्भपात की अनुमति खुद दी थी जिसमें आरोपी को “पति” बताया था।
- FIR घटना के लगभग एक महीने बाद दर्ज की गई, जिसकी कोई ठोस वजह नहीं दी गई।
- पीड़िता ने स्वयं कोर्ट में कहा कि अगर आरोपी से शादी हो जाती तो वह पुलिस में रिपोर्ट नहीं करती।
- उसके पिता ने भी स्वीकार किया कि सगाई में खर्च की गई राशि न लौटाने के कारण मामला दर्ज किया गया।
कोर्ट की टिप्पणी:
“पीड़िता एक अधिकारी है, शिक्षित है और भला-बुरा समझती है। इस स्थिति में यह मानना कठिन है कि उसके साथ जबरन संबंध बनाए गए होंगे। रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह सिद्ध हो सके कि संबंध केवल विवाह के झूठे वादे पर बनाए गए।”
कोर्ट ने यह कहते हुए आरोपी को संदेह का लाभ दिया और दोषमुक्त कर दिया।
न्यायिक फैसले पर उठते सवाल
इस फैसले ने एक बार फिर भारतीय न्याय प्रणाली में “सहमति बनाम जबरन संबंध” जैसे जटिल मुद्दों पर बहस को जन्म दिया है। क्या एक पढ़ी-लिखी, अधिकारी महिला की सहमति को स्वतः स्वीकृति मान लिया जाना न्यायसंगत है? क्या विवाह का वादा कर संबंध बनाना, फिर मुकर जाना, सहमति को स्वतः वैध बना देता है?



