
बिलासपुर न्यूज धमाका – छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाई कोर्ट ने एक नाबालिग पीड़िता के साथ हुए सामूहिक दुष्कर्म के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए दोषियों को निचली अदालत द्वारा दी गई 20-20 साल की सजा को बरकरार रखा है। अदालत ने यह स्पष्ट टिप्पणी की कि बच्चों के साथ यौन अपराधों में किसी भी प्रकार की नरमी न्याय और समाज—दोनों के लिए घातक सिद्ध होगी।
हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बीडी गुरु की खंडपीठ ने कहा:
“बच्चों के विरुद्ध यौन अपराध में नरमी बरतना समाज में गलत संदेश देगा और अपराधियों का मनोबल बढ़ाएगा।”
इस टिप्पणी के साथ पंकू कश्यप, मनोज बघेल और पिंकू कश्यप की अपील को खारिज कर दिया गया।
क्या था मामला?
यह घटना 26 अप्रैल 2019 की है। पीड़िता, जो उस समय नाबालिग (18 वर्ष से कम उम्र) थी, विवाह समारोह में शामिल होने के लिए गई थी। रात लगभग 11 बजे, जब वह वॉशरूम जा रही थी, तभी चार युवकों ने उसे जबरदस्ती खेत की ओर खींच लिया और सामूहिक दुष्कर्म की घटना को अंजाम दिया।
पीड़िता ने घटना के दौरान मोबाइल टॉर्च की रोशनी में आरोपियों की पहचान कर ली थी। उसी रात उसने अपनी मां को जानकारी दी और कोंडागांव थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई गई।
पुलिस ने एक नाबालिग समेत चारों आरोपियों को गिरफ्तार कर फास्ट ट्रैक कोर्ट (FTC), कोंडागांव में चालान पेश किया।
निचली अदालत का फैसला
फास्ट ट्रैक कोर्ट, कोंडागांव ने तीनों वयस्क आरोपियों को पॉक्सो एक्ट की धारा 6 और IPC की धारा 376D (सामूहिक बलात्कार) के तहत दोषी ठहराते हुए:
- 20-20 साल सश्रम कारावास
- 5,000 रुपये जुर्माना (जुर्माना नहीं चुकाने पर अतिरिक्त 3-3 साल की सजा)
सुनाई थी।
हाई कोर्ट की कानूनी व्याख्या
हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि,
“पीड़िता की एकमात्र गवाही यदि विश्वसनीय हो, तो दुष्कर्म जैसे मामलों में दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त होती है।”
अदालत ने माना कि इस मामले में पीड़िता की गवाही ठोस, स्पष्ट और विश्वसनीय थी। उन्होंने यह भी जोड़ा कि आरोपी ने बिना सहमति और इच्छा के पीड़िता के साथ बलात्कार किया, जो धारा 376D के तहत पूरी तरह से सामूहिक दुष्कर्म की श्रेणी में आता है।
समाजिक और न्यायिक संकेत
इस निर्णय से यह संदेश स्पष्ट हुआ है कि न्यायालय यौन अपराधों के मामलों में किसी भी प्रकार की ढिलाई के पक्ष में नहीं है, खासकर जब पीड़ित बच्चा या नाबालिग हो।
यह फैसला आने वाले समय में दुष्कर्म पीड़िताओं के न्यायिक संरक्षण के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है।



