
बिलासपुर न्यूज धमाका – छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने मंदिर की संपत्ति पर पुजारियों द्वारा किए गए मालिकाना हक के दावे को सिरे से खारिज करते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुजारी मंदिर के देवता की संपत्ति के केवल प्रबंधक और अनुदानकर्ता होते हैं, न कि उसके स्वामी।
क्या कहा कोर्ट ने?
- जस्टिस बी.डी. गुरु की एकलपीठ ने सुनवाई करते हुए कहा: “पुजारी का कार्य केवल संपत्ति का प्रबंधन है। वह काश्तकार मौरुशी (जिन्हें भूमि बेचने या गिरवी रखने का अधिकार होता है) नहीं है। यदि कोई पुजारी संपत्ति पर स्वामित्व का दावा करता है, तो यह कुप्रबंधन की श्रेणी में आता है।”
- अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि पुजारी अपने प्रबंधन दायित्व में विफल रहता है, तो मंदिर ट्रस्ट उसे सेवा से हटा सकता है।
मामले की पृष्ठभूमि:
- याचिका श्री विंध्यवासिनी मां बिलाईमाता पुजारी परिषद समिति की ओर से दाखिल की गई थी, जिसमें मंदिर ट्रस्ट समिति में नाम दर्ज करने की मांग की गई थी।
- तहसीलदार ने नाम जोड़ने का आदेश दिया था, जिसे एसडीएम, अतिरिक्त आयुक्त और राजस्व मंडल सभी ने खारिज कर दिया।
- अंतिम रूप से मामला हाईकोर्ट में लाया गया, जिसे अब अंतिम रूप से खारिज कर दिया गया है।
ट्रस्ट की वैधता और पुराना आदेश
- प्रतिवादी विंध्यवासिनी मंदिर ट्रस्ट का पंजीकरण जनवरी 1974 में हुआ था।
- ट्रस्ट को मंदिर की भूमि और संपत्ति के प्रबंधन का अधिकार सिविल न्यायालय द्वारा 1989 में दिए गए फैसले में भी मान्यता मिली थी।
- कोर्ट ने माना कि ट्रस्ट विधिवत पंजीकृत संस्था है और विवादित भूमि की देखरेख का अधिकार उसी को है।
याचिकाकर्ता की याचिका में खामियां
- याचिकाकर्ता मुरली मनोहर शर्मा वर्तमान याचिका में वह पक्षकार नहीं थे जिसे लेकर विवाद खड़ा हुआ था।
- हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि सही पक्ष द्वारा याचिका दायर नहीं की गई, इसलिए कानूनी रूप से याचिका खारिज करने का पूरा आधार बनता है।
कोर्ट की स्पष्ट टिप्पणी:
“मंदिर की संपत्ति को किसी व्यक्ति विशेष की पैतृक संपत्ति नहीं माना जा सकता। यह जन-संस्था की संपत्ति है, जिसकी जिम्मेदारी ट्रस्ट के पास है। पुजारी सिर्फ प्रबंधन के लिए नियुक्त व्यक्ति है, न कि स्वामी।”
निष्कर्ष:
यह फैसला न केवल इस एक मामले में स्पष्टता लाता है, बल्कि राज्यभर के मंदिरों में चल रहे संपत्ति विवादों के लिए भी महत्वपूर्ण कानूनी उदाहरण के रूप में देखा जाएगा।



