
केवल नौकरशाही और मीडिया का विभाजन नहीं हुआ है बल्कि प्रदूषण का भी हुआ है. भूगोल और मौसम के हिसाब से प्रदूषण की चिन्ताओं को बांट दिया है और उसे सीबीआई और ईडी के अफसरों की तरह विस्तार देते रहते हैं. जिस तरह अब सीबीआई के प्रमुख तक पांच साल के लिए मेवा विस्तार मिलेगा सॉरी सेवा विस्तार मिलेगा उसी तरह से वायु प्रदूषण को हर नवंबर के बाद अगले नवंबर के लिए विस्तार मिल जाता है.
केवल नौकरशाही और मीडिया का विभाजन नहीं हुआ है बल्कि प्रदूषण का भी हुआ है. भूगोल और मौसम के हिसाब से प्रदूषण की चिन्ताओं को बांट दिया है और उसे सीबीआई और ईडी के अफसरों की तरह विस्तार देते रहते हैं. जिस तरह अब सीबीआई के प्रमुख तक पांच साल के लिए मेवा विस्तार मिलेगा सॉरी सेवा विस्तार मिलेगा उसी तरह से वायु प्रदूषण को हर नवंबर के बाद अगले नवंबर के लिए विस्तार मिल जाता है. नवंबर के जाते ही अदालत, सरकार और मीडिया तीनों ख़ामोश हो जाते हैं. वैसे गोदी मीडिया भी अपने आप में एक तरह का प्रदूषण है और यह हर महीने पिछले महीने की तुलना में ज्यादा बढ़ जाता है. नवंबर 2016 में जब इंडियन एक्सप्रेस के फोटोग्राफर अभिनव साहा ने कालिंदी कुंज के पास यमुना बराज की तस्वीर छापी तब हंगामा मच गया. यह तो नहीं कह सकते कि वह पहली तस्वीर थी लेकिन उस तस्वीर ने पहली तस्वीर के जैसा ही असर किया था. हम भी उसके बाद दिल्ली के कालिंदी कुंज के पास पहुंच गए थे सोपान जोशी के साथ लेकिन 2016 से 2021 आ गया, लगता है प्रदूषण भी सेवा विस्तार पर है.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के हिसाब से पिछली सुनवाई में केंद्र के तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि पराली का योगदान 30 प्रतिशत है. सोमवार को सुनवाई के दौरान तुषार मेहता ने कहा कि 10 प्रतिशत है. सुप्रीम कोर्ट में जो केंद्र सरकार ने हलफनामा दिया है उस में लिखा है कि प्रदूषण फैलाने में पराली का सर्दियों में 4 प्रतिशत योगदान है जब कि गर्मिओं में 7 प्रतिशत. क्या केंद्र सरकार के पास सही आंकड़े नहीं था. इसे पहले भी राज्यसभा में केंद्र सरकार ने प्रदूषण पर आंकड़े दिया था. क्या केंद्र सरकार को राज्यसभा में दिए गए इस आंकड़े का पता नहीं था. क्या ये सब कार वालों और उद्योग वालों को बचाने के लिए किया जा रहा था? सवा करोड़ से अधिक वाहन दिल्ली में पंजीकृत हैं. इनमें 25 तीस लाख कारें हैं. इनसे होने वाले प्रदूषण के कारण कारों पर फाइन और जेल का कोई प्रावधान नहीं है. जबकि पंजाब में पिछले साल पचास हज़ार केस दायर हुए थे. इस साल एक भी नहीं. यूपी में दर्ज मुक़दमों को चुनाव के कारण वापस ले लिया गया. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार कुछ किसान इस मामले में जेल भी गए हैं.
दिल्ली में मेट्रो का नेटवर्क बिछ जाने के बाद भी कारों का इस्तमाल कम नहीं हुआ है. किराया इतना महंगा हो गया है कि बहुत से लोग अपनी बाइक और कार का ही इस्तमाल करने लगे हैं. सेंटर फार साइंस एंड एनवायरमेंट ने एक दुनिया के 9 महानगरों में मेट्रो के किराये का अध्ययन किया है. दिल्ली दूसरा सबसे महंगा महानगर है मेट्रो में चलने के मामले में. दिल्ली में काम करने वाला दिहाड़ी मज़दूर अपनी कमाई का बिना एसी वाले बस के सफर में 8 परसेंट खर्च करता है, एसी वाले बस में 14 परसेंट लगता है और दिल्ली मेट्रो में चलेगा तो 22 परसेंट खर्च करना पड़ेगा. इसका मतलब है कि मेट्रो आम से आम आदमी से दूर है. 15 लाख लोग हर दिन मेट्रो का इस्तमाल करते हैं. दिल्ली में जितनी बसें चाहिए वो भी कम हैं. दिल्ली सरकार ने महिलाओं के लिए बस का किराया मुफ्त कर दिया है लेकिन क्या महिलाएं बसों में चल रही हैं, क्या उन्हें समय पर बसें मिल रही हैं. यह देखना चाहिए. कुल मिलाकर कारों और बाइक के बोझ से दिल्ली की हवा प्रदूषित हो रही है और साल भर होती रहती है. हम वैज्ञानिक रूप से तो यही जानते हैं कि एक बार जो कार्बन हवा में जाता है वो दो सौ साल रहता है तो फिर ये बहस केवल नवंबर के महीने के लिए नहीं हो सकती है.
दिल्ली सरकार का कहना है की केंद्र सरकार ने किस महीने में ये रिपोर्ट तैयार की है कि पारली बड़ा कारण नहीं है और उद्योग, ट्रांसपोर्ट और धूल बड़े कारण हैं.
हम अब भी सतर्क नहीं हैं. देख रहे हैं कि स्कूल कालेज बंद किए जा रहे हैं. वर्क फ्राम होम को स्थायी व्यवस्था के रूप में देखना चाहिए. इसका संबंध केवल महामारी से नहीं रहा, प्रदूषण के लिए भी एक उपाय है फिर वर्क फ्राम होम को स्थायी तौर पर या एक दो साल के लिए क्यों नहीं लागू किया जा रहा है. क्या नवंबर के बाद प्रदूषण नहीं होता है? वाहनों से होने वाले प्रदूषण का समाधान पार्किंग फीस नहीं है. पार्किंग फीस से पार्किग की समस्या ही दूर नहीं होती है. एयर कंडीशन से क्या प्रदूषण दूर होता है तो फिर एयर कंडीशन की बिजली दरें अधिक क्यों नहीं हैं औऱ उनकी बिक्री पर अलग से प्रदूषण टैक्स क्यों नहीं है? आप अपने घर में कितने भी एसी लगा लें कोई रोक नहीं है. नवंबर के महीने में आप तालाबंदी कर कारों को बंद कर सकते हैं लेकिन क्या साल के बाकी समय इन कारों से प्रदूषण नहीं होता है? कई फैसले एक साथ लेने होंगे जैसे 15 साल पुराने वाहनों को बंद किया गया है उसी तरह मेट्रो को भी सस्ता करना होगा जैसे मेक्सिको ने किया. लोग कार छोड़ कर मेट्रो से चलने लगे. एक समय मैक्सिको को सबसे प्रदूषित शहर का दर्जा मिला था. मेक्सिको की हवा इतनी ज़हरीली हो गई थी कि पक्षी मरने लगे थे. प्रदूषण के कारण हज़ारों की संख्या में बच्चे मरने लगे लेकिन मैक्सिको ने इस समस्या को दूर किया है. दिल्ली क्यों नहीं कर सकती.
क्या सुप्रीम कोर्ट को यह भूमिका निभाते रहनी चाहिए या क्या उसकी जगह एक ऐसा मज़बूत कानून ढांचा बने जो सरकारों को प्रोत्साहित करे कि वे वायु प्रदूषण से निबटने की नीतियों को लागू करे?
प्रदूषण पर नज़र रखने की नियामक संस्थाओं को लेकर अलग संस्थाएं हैं. जानबूझ कर इनकी शक्ति कमज़ोर रखी जाती है. नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल बना दिया गया लेकिन वह केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड के आंकड़ों पर ही यकीन करेगा और उसके पास कितनी कम शक्तियां हैं. एक नई संस्था बन जाती है लेकिन वह भी पहले बनी संस्थाओं की तरह नाम की साबित होती है. अमरीका ने Environmental Protection Agency (EPA) नाम की संस्था बनाई तो उसे पर्याप्त अधिकार दे दिए. यही नहीं अमरीका में क्लीन एयर एक्ट बना है जिसके तहत वायु प्रदूषण को कम करने में राज्यों का जो खर्चा आएगा, उसका 60 प्रतिशत हिस्सा केंद्र से दिया जाएगा. भारत में भी केंद्र सरकार ने राज्यों को प्रदूषण से लड़ने के लिए 2200 करोड़ दिए हैं लेकिन इनकी कोई ऑडिट नहीं कि पैसा काफी है या नहीं, जो दिया गया है उसे किस तरह से खर्च किया गया है.
अगर सुप्रीम कोर्ट को यह कहना पड़े कि सरकार पूरी तरह नहीं बता रही है कि वह क्या कदम उठा रही है तो आप समझ सकते हैं कि इसे लेकर कौन कितना गंभीर है. पर्यावरण मंत्रालय के होते हुए कोर्ट को आदेश देना पड़ रहा है कि केंद्र आपातकालीन मीटिंग करे. कोर्ट ने कहा कि गुड़गांव नोएडा में भी निर्माण कार्य रोका जाना चाहिए लेकिन सेंट्रल विस्टा का निर्माण कार्य चल रहा है. क्या कोर्ट उसी मुस्तैदी से सेंट्रल विस्टा के लिए यह बात नहीं कह सकता है?
सब एक दूसरे पर टाल रहे हैं. राजनीति में धर्म का मुद्दा ज़्यादा हो गया है और प्रदूषण का मुद्दा गायब है. वही हाल अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी है. भारत कहता है कि 2070 तक कार्बन के उत्सर्जन को कम करेंगे, खूब हेडलाइन बनती है कि क्रांति हो गई, फिर भारत शर्त रखता है कि जब अमीर देश 1 ट्रिलियन डॉलर देंगे तब करेंगे. भारत कोयले के इस्तमाल को बंद करने की जगह घटाने की सहमति को जीत मानता है और दिल्ली जैसे शहर में वायु प्रदूषण के कारण शहर को बंद करने पर बहस करता है. इसका मतलब आप पर्यावऱण पर काम करने वाले पत्रकार और हमारे पूर्व सहयोगी ह्रदय जोशी के एक ट्वीट से समझ सकते हैं. ह्रदयेश ने लिखा है कि ”अंतरराष्ट्रीय मंच पर भले ही विकसित देश बेईमान और वादा फ़रामोश दिखते हों लेकिन दुनिया के सबसे ग़रीब मुल्क की सरकार भी अपने देश के भीतर बेईमान और अत्याचारी है. ग्लोबल वॉर्मिंग के लिए कार्बन उत्सर्जन से अधिक सर्वव्यापी पाखंड ज़िम्मेदार है. हर जलवायु परिवर्तन सम्मेलन की शुरूआत धरती को बचाने का आखिरी अवसर जैसे जुमलों से होती है और समापन होते ही महत्वपूर्ण कदम अगले सम्मेलन के लिए टाल दिए जाते हैं. यह जानते हुए भी कि इसके भयानक परिणाम हमारे सामने है.
वायु प्रदूषण से गरीब व्यक्ति ज्यादा प्रभावित होते हैं. क्योंकि वे घरों से बाहर होते हैं. पैसे वाले इस खेल को समझ गए हैं. सबने एयर प्यूरिफायर खरीदना शुरू कर दिया है. इस तरह से एक और किस्म का डिजिटल विभाजन पैदा हो गया है. इसे आप वायु-विभाजन कह सकते हैं. एक ही शहर में कुछ लोग एयर प्यूरिफायर से साफ हवा ले रहे हैं, और ज्यादातर लोग ज़हरीली हवा ले रहे हैं.
जिस कार से हवा प्रदूषित हो रही है उस कार के भीतर एयर प्यूरिफायर की टेक्नालजी आ गई है. 2200 से 20,000 तक में कार में एयर प्यूरिफायर लगा है जो अपने धुएं से हवा को प्रदूषित कर रही है. उसी तरह से पैसे वाले लोगों ने अपने घरों और दफ्तरों में एयर प्यूरिफायर लगा लिए हैं. कई लोगों ने अपने घरों में तीन तीन एयर प्यूरिफायर खरीदें हैं जिनकी कीमत तीस से साठ हज़ार तक की हो सकती है. बाज़ार में 40 हज़ार तक के एयर प्यूरीफायर आने लगे हैं. इकोनमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार दिवाली के बाद 500 करोड़ का एयर प्यूरिफायर बिका है. ज्यादातर एयर प्यूरिफायर दिल्ली एनसीआर में बिके हैं. फ्रेश एयर मास्क भी लांच हो चुका है. जिसके ज़रिए नाक के भीतर हवा साफ होकर जाती है. दूसरी तरफ 9 करोड़ गरीब लोगों को उज्ज्वला के तहत गैस का कनेक्शन दिया गया. लेकिन सिलेंडर का दाम इतना बढ़ गया है कि गरीब लोग वापस लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाने लगे हैं.
बाज़ार में सब बिक रहा है. पिछले साल राज्यसभा में आर के सिन्हा ने सवाल किया कि मास्क और एयर प्यूरिफायर का क्या असर है, क्या सरकार ने कोई अध्ययन किया है तो जवाब आता है कि नहीं. इससे पता चलता है कि हम प्रदूषण से जुड़े वैज्ञानिक कारणों और समाधानों का पता लगाने के लिए कितने तत्पर हैं. सरकार ने ज़रूर कहा कि दिल्ली में पांच जगहों पर एयर प्यूरीफायर लगे हैं लेकिन इनकी क्षमता पचास फीसदी से भी नीचे है. लेकिन ऐसा कोई प्यूरीफायर चौराहे पर लगता है तो हेडलाइन ऐसे छपती है जैसे हंड्रेड परसेंट क्षमता हो. सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई बुधवार को होगी.
प्रधानमंत्री सोमवार को भोपाल में थे. भगवान बिरसा मुंडा जनजातीय सम्मेलन का आयोजन किया गया था. जिसके लिए दावा किया गया था कि दो लाख आदिवासी लाए जाएंगे. अनुराग ने बताया था कि इस आयोजन के लिए राज्य सरकार 16 करोड़ से ज्यादा की रकम खर्च कर रही है इसमें से 13 करोड़ रुपए सिर्फ लोगों को जंबूरी मैदान पर होने वाले कार्यक्रम में लाने ले जाने में ही खर्च होंगे. इस कार्यक्रम के लिए मध्य प्रदेश के 52 ज़िलों से लोगों को लाया जाना था, उनके खाने पीने से लेकर रुकने पर करीब 13 करोड़ खर्च होना था.
हर आयोजन को भव्य स्तर पर ले जाने की कीमत होती है. करोड़ों रुपये के इस आयोजन का राजनीतिक लाभ हो सकता है लेकिन इस तरह के कई आयोजनों पर जो पैसा खर्च हो रहा है उसका अंदाज़ा तब लगेगा जब इसका कोई हिसाब सामूहिक रुप से सामने हो. इतना पैसा खर्च होने के बाद भी कुर्सियां खाली रह गईं.Listen to the latest songs, only on JioSaavn.comhttps://www.jiosaavn.com/embed/playlist/6689255
यूपी में नौकरशाही कैसे काम करती है सुप्रीम कोर्ट की दो टिप्पणियों से उसकी झलक मिल जाती है. पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने यूपी के वित्त सचिव और अपर मुख्य सचिव को गिरफ्तारी से राहत नहीं दी और कहा कि यूपी के अफसरों ने अदालत को खेल का मैदान समझ लिया है. लखीमपुर खीरी केस में सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया कि केस की जांच के लिए जो SIT बनी है उसमें ज्यादातर सब इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारी हैं. इसे अपग्रेड किया जाए और इसमें यूपी काडर के अफसर तो हों लेकिन यूपी के न हों. ये विश्वसनीयता रह गई है यूपी के अफसरों की. दूसरी तरफ केंद्र को अपनी नौकरशाही पर इतना भरोसा हो गया है वह सीबीआई और ईडी के प्रमुख को पांच साल तक सेवा विस्तार देने का अध्यादेश लेकर आ गई है. इससे दूसरे अफसरों को प्रमुख बनने का तनाव दूर हो जाएगा, चांस ही नहीं आएगा, तो वहीं कांग्रेस का कहना है कि पहली बार सेवा विस्तार का यह खेल नहीं खेला गया है. कुछ राज़ छिपाने होंगे, गलत काम कराना होगा तो पद का इनाम दिया जा रहा है. आपको कुछ नहीं दिया जा रहा है.
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