
बिलासपुर न्यूज धमाका – छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने हत्या के प्रयास के एक मामले में नाबालिग आरोपी को दी गई उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने किशोर न्याय अधिनियम, 2015 (JJ Act) की धारा 21 का उल्लंघन किया है और किशोर को वयस्क मानते हुए सुनवाई करना त्रुटिपूर्ण था। यह फैसला अब एक महत्वपूर्ण नजीर (AFR) बन चुका है।
क्या था मामला
कोरबा जिले में वर्ष 2017 में एक 17 वर्षीय किशोर पर हत्या के प्रयास (धारा 307 IPC) का मामला दर्ज हुआ था। प्रारंभिक जांच में किशोर की आयु 16 से 18 वर्ष के बीच पाई गई। किशोर न्याय बोर्ड ने इसे “जघन्य अपराध” मानते हुए मामला बाल न्यायालय को रेफर कर दिया।
बाल न्यायालय ने किशोर को वयस्क मानते हुए सुनवाई की और उम्रकैद की सजा सुनाई।
हाई कोर्ट का फैसला
न्यायमूर्ति संजय के अग्रवाल की एकल पीठ ने किशोर की अपील पर सुनवाई करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने कहा:
- IPC की धारा 307 में न्यूनतम सात वर्ष की सजा स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं है, इसलिए यह अपराध जघन्य नहीं, बल्कि गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है।
- किशोर को वयस्क मानकर सजा देना JJ Act की धारा 21 का उल्लंघन है, जिसमें कहा गया है कि किसी किशोर को ऐसी सजा नहीं दी जा सकती जो उसकी रिहाई की संभावना को खत्म कर दे।
फैसले के कानूनी बिंदु
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के शिल्पा मित्तल बनाम भारत सरकार केस का हवाला देते हुए कहा कि:
- किसी अपराध को जघन्य मानने के लिए उसमें न्यूनतम 7 वर्ष की सजा का स्पष्ट प्रावधान होना आवश्यक है।
- चूंकि धारा 307 में ऐसा नहीं है, अतः बाल न्यायालय का किशोर को वयस्क मानना अनुचित और गैर-कानूनी है।
क्या निर्देश दिए गए
हाई कोर्ट ने मामले को दोबारा सुनवाई के लिए किशोर न्याय बोर्ड को वापस भेज दिया है। साथ ही, फैसले की कॉपी सभी बाल न्यायालयों और बाल कल्याण बोर्डों को भेजने के निर्देश दिए हैं ताकि भविष्य में इस तरह की कानूनी त्रुटियां न हों।
महत्वपूर्ण निष्कर्ष
यह फैसला किशोर न्याय प्रणाली की मूल भावना — पुनर्वास और पुनः एकीकरण — को रेखांकित करता है और स्पष्ट करता है कि किसी किशोर को दंड नहीं, सुधार की आवश्यकता है।


