
बिलासपुर न्यूज धमाका – छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने गुरुघासीदास सेंट्रल यूनिवर्सिटी, कोटा में आयोजित राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) शिविर में “योग के बहाने जबरन नमाज पढ़वाने” के आरोप में दर्ज एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया है। मामले में नामजद सात सहायक प्राध्यापकों की याचिका को हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने खारिज कर दिया।
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता सहायक प्राध्यापक 26 मार्च से 1 अप्रैल 2025 तक आयोजित NSS कैंप की निगरानी पर नियुक्त थे। इसी दौरान तीन छात्रों ने कोनी थाना में शिकायत दर्ज करवाई कि हिंदू होने के बावजूद उन्हें योग के बहाने नमाज पढ़ने के लिए मजबूर किया गया।
छात्रों का आरोप है कि प्राध्यापकों को यह स्पष्ट जानकारी थी कि वे सभी हिंदू धर्म के अनुयायी हैं, इसके बावजूद उन पर धार्मिक क्रियाएं थोपने का प्रयास किया गया।
दर्ज धाराएं और कानून:
प्राध्यापकों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा:
- 190 – गैरकानूनी सभा
- 196(1)(B) – धार्मिक समूहों में वैमनस्य फैलाने का प्रयास
- 197(1)(B)/(C) – राष्ट्रीय एकता को प्रभावित करने वाले दावे
- 299 – धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर ठेस पहुँचाना
- 302 – दुर्भावनापूर्ण शब्द बोलना
के साथ-साथ, छत्तीसगढ़ धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम, 1968 की धारा 4 के तहत मामला दर्ज किया गया है।
प्राध्यापकों की दलील: “राजनीतिक प्रेरणा से हुई शिकायत”
याचिकाकर्ताओं ने अदालत में कहा कि शिकायत दर्ज करने में 14–15 दिनों की देरी हुई, जिससे स्पष्ट होता है कि यह राजनीति से प्रेरित है। उनका दावा था कि कार्यक्रम में करीब 150 हिंदू छात्र शामिल थे, जिनमें से केवल तीन ने शिकायत दर्ज करवाई। जबकि, सिर्फ चार मुस्लिम छात्रों ने नमाज अदा की, जिसमें उनका कोई दखल नहीं था।
उनके अधिवक्ता ने तर्क दिया कि एफआईआर में लगाए गए आरोप पूर्णतः असत्य और दुर्भावनापूर्ण हैं, अतः इसे निरस्त किया जाए।
राज्य सरकार का पक्ष: “गंभीर आरोप हैं”
राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता कार्यालय ने तर्क दिया कि आरोप गंभीर हैं और जांच के इस प्रारंभिक चरण में FIR को रद्द करना उचित नहीं होगा।
अदालत का फैसला: “जांच की स्थिति में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता”
जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस राकेश मोहन पांडेय की डिवीजन बेंच ने कहा कि:
“याचिकाकर्ता पहले से ही जमानत पर हैं, और मामले में अब तक चार्जशीट दाखिल नहीं हुई है। इस स्तर पर मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी करना या हस्तक्षेप करना अनुचित होगा।”
अतः अदालत ने याचिका खारिज कर दी।
निष्कर्ष:
यह मामला धार्मिक स्वतंत्रता, शैक्षणिक संस्थानों में तटस्थता, और राजनीतिक दखल जैसे गंभीर विषयों को छूता है। पुलिस जांच जारी है और अंतिम निष्कर्ष आने तक प्रकरण न्यायिक निगरानी में बना रहेगा।



