
नारायणपुर न्यूज़ धमाका /// बस्तर का जनजाति समाज अपनी अनोखी संस्कृति के लिए जाना जाता है। यह अनोखी संस्कृति उन्हें विरासत में मिली है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक अविरल चलती रहती है। ऐसे बहुत से स्थल हैं जो आदिवासी समाज के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इन स्थलों से आदिवासी समाज की आस्था एवं विश्वास जुड़ा हुआ है।
गोण्डी शब्द का अर्थ है आना अर्थात आत्मा और कुड़मा यानि घर। सामान्य बोलचाल की भाषा में इसे आत्माओं का घर भी बोलते है बस्तर के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में इस परंपरा का आदिवासी समाज बहुत ही कट्टरता से पालन करते आ रहे है।
ऐसे स्थान पर महिलाओं और युवतियों का प्रवेश पूर्ण रूप से प्रतिबंधित होता है। शादी की रस्म अदायगी से पहले यह जाना बेहद जरूरी होता है। हल्दी या तेल की रस्म हो या फिर शादी कार्ड का वितरण करना हो यहां न्योता दिए बिना किसी भी कार्य की शुरुआत नहीं की जाती है। इस स्थल को आदिवासी समाज अपने पितृ देव को स्थापित कर पूजता है।
हर एक गांव में आना कुड़मा यानी आत्माओं का घर कई दशकों से बनाया गया है।आदिवासी समाज के लोग इस पवित्र स्थल को लेकर बहुत ही सावधानी बरतते है।फल, फूल या नई फसल को यहां चढ़ाने से पहले आदिवासी समाज के लोग उपयोग नहीं करते हैं। ग्रामीणों की मान्यता के अनुसार भूलवश या जानबूझकर किसी के द्वारा आना कुड़मा में चढ़ावा दिए बगैर नई फसल का उपयोग कर लेता है तो गांव में संकट आ जाते है। इसके निपटारे के लिए ग्रामीण गायता के पास जाते हैं वहां गलती स्वीकार करने के बाद पूजा पाठ किया जाता है
किसी भी गांव के किनारे एक मंदिरनुमा छोटी सी संरचना होती है जो चारों तरफ से घिरी रहती है। एक छोटा सा कमरा होता है जिसमें बहुत सी मृदभांड रखी रहती हैं। इन मृदभांडों में ही आदिवासी समाज के पितरों का वास होता है। अबूझमाड़ के आदिवासी गांव में एक गोत्र के लोगों का बाहुल्य होता है।
गोत्र के लोगों के मृत्यु पश्चात उनकी आत्माओं को इस आना कुरमा में स्थापित किया जाता है।आदिवासी समाज का मानना है की यह उनके पितृ देव उनके रक्षक देव है। उनका एक साथ एक जगह पर होने पर उनकी शक्ति असीमित हो जाती है और वह बुरी आत्माओं का नाश करने में सक्षम हो जाते हैं। यही कारण है कि आदिवासी समाज अपने पितृ देवों को भी एक अलग मंदिर में स्थापित करता है जिसे आना कुड़मा कहा जाता है।

