
मानपुर न्यूज धमाका – तीसरी बार पुल टूटा, तीन गांव टापू में तब्दील — प्रशासन अब भी मौन। यह स्थिति है मोहला-मानपुर जिले के कोराचा-बुकमरका मार्ग की, जहां गट्टेगहन नदी पर बना पुल फिर से ढह गया है। लगातार हो रही बारिश के चलते पुल बह गया, जिससे संबलपुर, बुकमरका और सुड़ियाल गांव का संपर्क पूरी तरह कट गया है।
यह वही पुल है जिसे दो साल पहले पीएमजीएसवाई (प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना) के तहत बनाया गया था, और तब से अब तक यह तीन बार टूट चुका है।
जनजीवन अस्त-व्यस्त, स्कूल और पुलिस कैंप का संपर्क टूटा
- ग्रामीणों के अनुसार, पुल टूटने के कारण:
- बच्चों का स्कूल जाना बंद हो गया है।
- संबलपुर पुलिस कैंप का जिला मुख्यालय से संपर्क टूट गया है।
- कई राहगीर नदी पार करते वक्त फँस गए हैं और जोखिम लेकर आवागमन कर रहे हैं।
निर्माण में भारी भ्रष्टाचार के आरोप
स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि पुल निर्माण में गंभीर अनियमितताएँ और गुणवत्ताहीन सामग्री का प्रयोग किया गया।
- पिछले वर्ष भी इसी पुल के दो बार टूटने की घटनाएं हुई थीं।
- सांसद संतोष पांडे और डिप्टी सीएम विजय शर्मा को मामले की जानकारी दी गई थी।
- नेताओं ने कार्रवाई का आश्वासन दिया था, लेकिन न कोई इंजीनियर दंडित हुआ और न ही ठेकेदार पर कार्रवाई हुई।
प्रशासनिक चुप्पी पर उठे सवाल
पीएमजीएसवाई के एसडीओ विजय सोनी ने स्वीकार किया कि “पुल टूटने की जानकारी मिली है। ठेकेदार को निर्माण के निर्देश दे दिए गए हैं, पानी उतरने के बाद कार्य शुरू होगा।”
लेकिन सवाल यह उठता है कि:
- दो साल में तीन बार पुल टूटने पर कोई तकनीकी ऑडिट क्यों नहीं हुआ?
- क्यों नहीं ठेकेदार और साइड इंजीनियर पर एफआईआर या ब्लैकलिस्टिंग जैसी कठोर कार्रवाई की गई?
ग्रामीणों का कहना है कि यह ठेकेदार-इंजीनियर-प्रशासन गठजोड़ का नतीजा है, जिसका खामियाजा स्कूली बच्चे, किसान और दैनिक यात्री भुगत रहे हैं।
क्या कहता है कानून और नीति?
PMGSY के दिशा-निर्देशों के अनुसार, निर्माण के बाद कम से कम 5 साल तक रखरखाव की जिम्मेदारी ठेकेदार की होती है। लगातार टूटते पुल की स्थिति यह स्पष्ट करती है कि या तो निर्माण में भ्रष्टाचार हुआ है या गुणवत्ता का परीक्षण ही नहीं किया गया।
ज़रूरी सवाल
- दो साल में तीन बार पुल कैसे टूट गया?
- जब पिछले दो हादसों के बाद कार्रवाई का वादा किया गया था, तो तीसरे बार फिर वही कहानी क्यों दोहराई गई?
- क्या सरकार की ग्रामीण कनेक्टिविटी योजना सिर्फ कागज़ों तक सीमित है?
