
26 अगस्त 2026 //
जगदलपुर न्यूज़ धमाका – बस्तर की ढोकरा और लौह शिल्प कला महंगे कच्चे माल से संकट में है। 50-60 रुपए किलो का लोहा 150-200 रुपए पहुंचा, कोयला और पॉलिश भी महंगे हुए।
छत्तीसगढ़ का बस्तर अपनी आदिवासी संस्कृति, लोक परंपराओं और हस्तशिल्प के लिए देश-दुनिया में अलग पहचान रखता है। इन्हीं पारंपरिक कलाओं में ढोकरा कला का विशेष स्थान है। बेल मेटल से तैयार होने वाली यह कला केवल सजावटी वस्तुओं का निर्माण नहीं, बल्कि बस्तर की जनजातीय जीवनशैली, प्रकृति और सांस्कृतिक विरासत को धातु में अभिव्यक्त करने का माध्यम है। बस्तर ढोकरा को वर्ष 2008 में भौगोलिक संकेतक (जीआई) पंजीकरण प्राप्त हुआ है। सदियों पुरानी परंपरा में हर कलाकृति हाथों से गढ़ी जाती है।
सरकारी खरीदी के बदले तरीके से कारीगर परेशान
बस्तर में ढोकरा कला मुख्य रूप से घड़वा समुदाय से जुड़ी मानी जाती है। इसके डिजाइनों में जनजातीय जीवन, धार्मिक अनुष्ठान, पशु-पक्षी, जंगल, पहाड़, खेत और रोजमर्रा की गतिविधियों की झलक दिखाई देती है। इन दिनों बेलमेटल और लौहशिल्प कला रॉ मटेरियल के मंहगा होने से संकट में है। दूसरी परेशानी शिल्पियों से उनके बनाए कलाकृति की खरीदी को लेकर है। पहले क्वॉलिटी और कलाकृति की बारीकी को देखकर खरीदी होती थी लेकिन अब सरकारी खरीदी तौल कर होने से इस कला की बारीकी और क्वॉलिटी दोनों खत्म हो रही है।
महंगे लोहा-कोयले से लौह शिल्प का लागत बढ़ी
शिल्पकार भी बारीकी में कम बल्कि वजन और सामान्य निर्माण में ध्यान देने लगे हैं। वहीं खुले बाजार में बारीकी और क्वॉलिटी की मांग होने से दोनों तरह के काम हो रहे हैं। हरिभूमि ने नगरनार के प्रसिद्ध लौह शिल्पी विद्याधर विश्वकर्मा से चर्चा की। उन्होंने बताया कि लौह शिल्प में मुख्य रूप से लोहा और कोयला का इस्तेमाल होता है इन दोनों का दाम दोगुना तिगुना बढने से परेशानी हो रही है। पहले 50-60 रुपए किलो में लोहा मिल जाता था जो अब 150 से 200 रुपए में मिल रहा है। वहीं कोयला भी महंगा हो गया है ओडिशा के कोटपाड से लाकर 150 रुपए पीपा में दे रहे हैं जो पहले 30-40 रुपए में मिल जाता था। वहीं पॉलिश आइटम भी मंहगा हुआ है।
बस्तर और कोंडागांव जिले में धातु शिल्प का काम
बस्तर जिले के चिलकुटी, एर्राकोट, केमरा, अलवाई और खोरखोसा तथा कोंडागांव जिला ढोकरा मेटल क्राफ्ट (धातु शिल्प) के पारंपरिक संरक्षक हैं। यह ‘लॉस्ट-वैक्स कास्टिंग’ (मोम पिघलाकर साँचा बनाने) की एक प्राचीन प्रक्रिया है। विशेषज्ञ इस तकनीक को सिंधु घाटी सभ्यता की मशहूर कांस्य मूर्ति डांसिंग गर्ल से जोड़ते हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में धातु-निर्माण की सबसे पुरानी परंपराओं से इसका संबंध बताते हैं।
सरकार से मिल रहा 5000 पेंशन
लौह शिल्पी नगरनार विद्याधर विश्वकर्मा ने बताया कि दादा परदादा जमाने से हमारा परिवार लौहशिल्प निर्माण का काम कर रहा है। मैं स्वयं 50 साल से इस काम में लगा हूं। मेरे दो बेटे भी यही काम कर रहे है तथा उनके बच्चे भी पढाई के बाद कुछ समय देकर रूचि ले रहे हैं। इस कला के कारण अमेरिका और हांगकांग तथा देश के सभी बड़े शहरों में जाने का अवसर मिला है। राष्ट्रपति और प्रदेश सरकार से सम्मान मिला है। हर महीने 5000 पेशन मिल रहा है। समस्या मार्केटिंग और सामान के मंहगा होने से है, इस पर सरकार ध्यान दे।

