
08 अगस्त 2026 //
रायपुर न्यूज़ धमाका – के पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में आयोजित राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के प्रदेश स्तरीय सम्मेलन में इन महिलाओं ने पहली बार बड़े मंच पर पूरे आत्मविश्वास के साथ रैंप वॉक किया।
बस्तर में कभी बारूद और हिंसा के माहौल से जुड़ी रहीं आत्मसमर्पित आदिवासी युवतियों ने अब बदलाव की नई राह पकड़ ली है। रायपुर के पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में आयोजित राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के प्रदेश स्तरीय सम्मेलन में आदिवासी महिलाओं ने पहली बार बड़े मंच पर पूरे आत्मविश्वास के साथ रैंप वॉक किया। पारंपरिक परिधानों में सजे मंच पर उनकी प्रस्तुति ने कार्यक्रम में मौजूद लोगों का ध्यान खींचा और ऑडिटोरियम तालियों से गूंज उठा।
बारूद की दुर्गंध से दूर मिली नई दुनिया
आत्मसमर्पित महिलाओं ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि बस्तर में बारूद की दुर्गंध और हिंसा के माहौल से दूर अब उन्हें जिंदगी को नए नजरिए से देखने का अवसर मिल रहा है। कभी बड़े मंच और सैकड़ों लोगों के सामने रैंप वॉक करना उनके लिए कल्पना से परे था, लेकिन शासन-प्रशासन के सहयोग से उन्हें यह मौका मिला।
फुनेमदेवे ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि मार्च 2026 से पहले तक उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि वह इतने बड़े मंच पर लोगों के सामने रैंप वॉक करेंगी। कम पढ़ाई के बावजूद अपनी प्रतिभा को निखारने और खुद को नए रूप में प्रस्तुत करने का अवसर उन्हें मिला है। उन्होंने कहा कि परिवार और परिस्थितियों के कारण पढ़ाई के ज्यादा अवसर नहीं मिल सके, लेकिन अब जीवन में आगे बढ़ने और अपनी पहचान बनाने की नई राह दिखाई दे रही है।
आधुनिक पहनावे के साथ बस्तर की संस्कृति को बढ़ाने की कोशिश
टीम लीडर के साथ रायपुर पहुंची आत्मसमर्पित महिलाओं और बस्तर की बेटियों ने अब रेशम, हथकरघा और हस्तशिल्प से जुड़े स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने का प्रयास शुरू किया है। उनका उद्देश्य बस्तर की पारंपरिक कला, संस्कृति और जीवनशैली को नई पहचान दिलाना है।
रैंप पर पारंपरिक कोसा और हैंडलूम परिधानों में महिलाओं की प्रस्तुति इसी बदलाव की झलक रही। चकाचौंध रोशनी और बड़ी संख्या में मौजूद दर्शकों के बीच रैंप वॉक करने से महिलाओं का आत्मविश्वास भी बढ़ा।
कार्यक्रम के दौरान इन महिलाओं ने अपने इस अनूठे अनुभव को हरिभूमि से बातचीत में साझा किया। उन्होंने बताया कि उनके लिए यह सिर्फ रैंप वॉक नहीं था, बल्कि पुराने जीवन से निकलकर नई पहचान की ओर बढ़ने का अनुभव था। मंच पर लोगों की तालियों और उत्साहवर्धन ने उन्हें आगे बढ़ने का हौसला दिया।
सुबह से शाम तक उत्सव जैसा माहौल
पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में आयोजित प्रदेश स्तरीय बुनकर सम्मेलन एवं स्वदेशी प्रदर्शनी में प्रदेशभर से सैकड़ों बुनकर, शिल्पकार और कलाकार पहुंचे। सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे तक पूरे परिसर में उत्सव जैसा माहौल रहा। हथकरघा, हस्तशिल्प, रेशम, माटीकला और अन्य स्वदेशी उत्पादों की प्रदर्शनी लोगों के आकर्षण का केंद्र रही।

मुख्यमंत्री ने भी बढ़ाया महिलाओं और कारीगरों का उत्साह
कार्यक्रम में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने आत्मसमर्पित महिलाओं से आत्मीय संवाद किया और उनका हौसला बढ़ाया। उन्होंने महिलाओं को उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएं दीं। मुख्यमंत्री ने प्रदेशवासियों से स्वदेशी उत्पादों को अपनाने और ‘सेल्फी विद स्वदेशी’ अभियान से जुड़ने की भी अपील की।
इस दौरान विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह और ग्रामोद्योग मंत्री गजेंद्र यादव भी मंच पर मौजूद रहे। मुख्यमंत्री ने कहा कि स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने से बुनकरों, शिल्पकारों और कारीगरों की मेहनत को बाजार मिलेगा और उनकी आजीविका मजबूत होगी
कोशल फैब ब्रांड की भी हुई शुरुआत
कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ राज्य हथकरघा संघ के नए प्रीमियम हैंडलूम ब्रांड ‘कोशल फैब’ का शुभारंभ किया गया। मुख्यमंत्री ने ब्रांड के लोगो और कैटलॉग का विमोचन किया। इसके जरिए छत्तीसगढ़ के कोसा और पारंपरिक हथकरघा उत्पादों को देश और विदेश के बाजार तक पहुंचाने की योजना है।
बुलकरों औक कारीगरों के लिए कई घोषणाएं
सम्मेलन में मेधावी विद्यार्थियों, वरिष्ठ बुनकरों, शिल्पकारों और माटी शिल्पियों को पुरस्कार, अनुदान और आधुनिक उपकरण प्रदान किए गए। 935 मेधावी छात्र-छात्राओं को 81.83 लाख रुपये की प्रोत्साहन राशि दी गई। वहीं बुनकरों को आवास, आधुनिक करघे और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की जानकारी दी गई।
सरकार की ओर से बताया गया कि पिछले ढाई वर्षों में बुनकरों और महिला स्व-सहायता समूहों को आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए कई योजनाएं संचालित की गई हैं। साथ ही छत्तीसगढ़ के हथकरघा और हस्तशिल्प उत्पादों को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजार उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया जा रहा है, राष्ट्रीय हथकरघा दिवस का यह आयोजन जहां छत्तीसगढ़ के बुनकरों और कारीगरों के हुनर को मंच देने वाला रहा, वहीं आत्मसमर्पित आदिवासी महिलाओं का रैंप वॉक बस्तर में बदलाव, पुनर्वास और नई जिंदगी की ओर बढ़ते कदमों की सबसे भावनात्मक तस्वीर बनकर सामने आया।



