
बिलासपुर न्यूज धमाका – छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मंदिर संपत्ति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि पुजारी को मंदिर की संपत्ति का स्वामित्व नहीं दिया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि पुजारी केवल देवता की पूजा करने और मंदिर के दैनिक कार्यों के सीमित प्रबंधन के लिए नियुक्त प्रतिनिधि होता है, न कि मंदिर की भूमि या संपत्ति का स्वामी।
क्या है मामला?
यह फैसला धमतरी जिले के श्री विंध्यवासिनी मां बिलाईमाता मंदिर के पुजारी परिषद अध्यक्ष मुरली मनोहर शर्मा की ओर से दायर याचिका पर सुनाया गया। शर्मा ने राजस्व मंडल, बिलासपुर द्वारा उनकी पुनरीक्षण याचिका खारिज करने के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
विवाद की शुरुआत:
- शर्मा ने तहसीलदार के समक्ष आवेदन देकर अपने नाम को मंदिर ट्रस्ट के रिकॉर्ड में शामिल करने की मांग की थी।
- तहसीलदार ने उनके पक्ष में आदेश दिया, लेकिन एसडीओ ने उसे रद्द कर दिया।
- शर्मा ने इसके खिलाफ अपर आयुक्त रायपुर, फिर राजस्व मंडल में अपील की, जो क्रमशः खारिज कर दी गईं।
- अंततः उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की।
हाईकोर्ट का रुख और निर्णय:
जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की एकलपीठ ने सुनवाई करते हुए कहा:
- मंदिर की संपत्ति की वैधानिक स्वामी मंदिर ट्रस्ट समिति है, न कि कोई व्यक्ति।
- ट्रस्ट समिति किसी व्यक्ति को प्रबंधक नियुक्त कर सकती है, लेकिन इससे वह व्यक्ति संपत्ति का मालिक नहीं बन जाता।
- पुजारी एक “ग्राही” (धारक) होता है, जो केवल पूजा और धार्मिक कर्तव्यों के लिए नियुक्त होता है।
- यदि पुजारी अपने कर्तव्यों का सही से पालन नहीं करता, तो उसका अधिकार वापस भी लिया जा सकता है।
न्यायालय की अहम टिप्पणी:
“धार्मिक सेवा का अधिकार और संपत्ति का स्वामित्व दो भिन्न बातें हैं। पुजारी को मंदिर संपत्ति का मालिक नहीं माना जा सकता।”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मंदिर ट्रस्ट 23 जनवरी 1974 से विधिवत पंजीकृत संस्था है और उसके पास ही मंदिर और उसकी संपत्ति के प्रबंधन का पूर्ण अधिकार है।
इस फैसले का महत्व:
यह निर्णय राज्य भर में चल रहे मंदिर संपत्ति विवादों के लिए एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। यह पुजारियों और मंदिर ट्रस्टों के बीच भूमिका और अधिकारों की स्पष्ट रेखा खींचता है।



