
बिलासपुर न्यूज धमाका – छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने 165 किलो गांजा तस्करी के एक मामले में आरोपी को बड़ी राहत देते हुए उसे 15 साल बाद बरी कर दिया है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि केवल संदेह के आधार पर दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता और पुलिस द्वारा पेश किए गए सबूत अपर्याप्त हैं।
फैसला: संदेह पर्याप्त नहीं, सबूत जरूरी
मुख्य न्यायाधीश संजय एस. अग्रवाल और न्यायमूर्ति राधाकिशन अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने 26 जून को सुनाए फैसले में विशेष न्यायालय के 2011 के फैसले को सही ठहराया, जिसमें आरोपी को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया था।
हाई कोर्ट ने साफ कहा:
“जब्ती की प्रक्रिया में गंभीर खामियां हैं, गवाहों ने पुलिस की कहानी का समर्थन नहीं किया। ऐसे में आरोपी को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं होगा।”
पृष्ठभूमि: क्या था पूरा मामला
- 22 मार्च 2010: बलौदा थाना प्रभारी एसआई डी.एल. मिश्रा को सूचना मिली कि विष्णु कुमार सोनी नामक व्यक्ति के घर में बड़ी मात्रा में गांजा छिपाकर रखा गया है।
- छापेमारी में 8 बोरियों में 165 किलो गांजा, ₹15,240 नकद, और तौलने की मशीन जब्त की गई।
- आरोपी के खिलाफ NDPS एक्ट की धारा 20(बी)(2)(C) के तहत मामला दर्ज हुआ।
ट्रायल कोर्ट का निर्णय: 2011 में मिली थी राहत
विशेष न्यायाधीश ने 5 मार्च 2011 को आरोपी को बरी कर दिया था, यह मानते हुए कि:
- गवाह अपने बयान से मुकर गए,
- पंचनामा और तौल प्रक्रिया में अनियमितताएं थीं,
- जब्त सैंपलों पर सील और चिन्हों का स्पष्ट उल्लेख नहीं था,
- मलकाना रजिस्टर में विवरण अस्पष्ट था।
राज्य सरकार ने की थी चुनौती
- राज्य सरकार ने हाई कोर्ट में विशेष अदालत के निर्णय को चुनौती दी।
- डिप्टी गवर्नमेंट एडवोकेट ने दलील दी कि सबूतों की गलत व्याख्या की गई है और जब्ती की कार्रवाई विधिसम्मत थी।
हालांकि, हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्ववर्ती निर्णयों का हवाला देते हुए कहा:
“यदि ट्रायल कोर्ट ने संदेह के आधार पर आरोपी को बरी किया है, तो उच्च न्यायालय उसमें हस्तक्षेप तभी करेगा जब निर्णय स्पष्ट रूप से त्रुटिपूर्ण हो।”
फैसले में हाई कोर्ट ने जिन खामियों को माना:
- जब्ती प्रक्रिया में स्पष्ट सीलिंग की कमी,
- मलकाना रजिस्टर में गड़बड़ियां,
- गवाहों के बयानों में विरोधाभास,
- न्यायिक जांच में प्रमाणों की विश्वसनीयता नहीं बन पाई।
निष्कर्ष: न्याय में देरी लेकिन राहत मिली
15 साल लंबे मुकदमे के बाद आरोपी को मिली राहत ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि:
“न्याय संदेह पर नहीं, सबूत पर आधारित होता है।”
यह फैसला न केवल अभियोजन प्रक्रिया में पारदर्शिता और सटीकता की आवश्यकता को रेखांकित करता है, बल्कि यह भी याद दिलाता है कि कानून की नजर में दोष सिद्ध करने के लिए ठोस प्रमाण आवश्यक हैं।



