
बिलासपुर न्यूज धमाका – छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिला जेल में 29 वर्षीय आदिवासी युवक नीरज भोई की हिरासत में मौत ने मानवाधिकारों और जेल प्रशासन की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में नीरज की मौत का कारण गला दबाना बताया गया है, जबकि शरीर पर 35 से अधिक चोटों के निशान भी पाए गए हैं। मामला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट पहुंचा, जिसने इसे हिरासत में मौत मानते हुए राज्य सरकार से दो सप्ताह में विस्तृत रिपोर्ट तलब की है।
गिरफ्तारी से 3 दिन में संदिग्ध मौत
नीरज भोई, निवासी ग्राम पिपरौद (महासमुंद) को 12 अगस्त 2024 को BNS की धारा 103 और 3(5) के तहत गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था। गिरफ्तारी के बाद उसका मेडिकल परीक्षण भी हुआ था, जिसमें उसे अवसादग्रस्त और शराब का आदी बताया गया था। जेल में दाखिल होने के तीसरे दिन 15 अगस्त को उसकी हालत बिगड़ गई और उसे जिला अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
जेल प्रशासन की सफाई, परिजनों के आरोप
जेल प्रशासन ने युवक की मौत का कारण “शराब न मिलने से उत्पन्न मानसिक असंतुलन” बताया है। वहीं मृतक के परिजनों ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि नीरज को जेल में बेरहमी से पीटा गया और फिर उसकी गला दबाकर हत्या कर दी गई। परिजनों की शिकायत के बाद राज्य सरकार ने न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे
- गले में दबाव के निशान, जिससे मौत की पुष्टि।
- शरीर पर 35 चोटों के निशान, जिनमें से 8 आंतरिक चोटें गंभीर और घातक बताई गई हैं।
- गिरफ्तारी के समय कोई चोट नहीं थी, मेडिकल रिपोर्ट स्पष्ट।
इन तथ्यों के आधार पर मामले को हिरासत में मौत माना गया है, जो संविधान और मानवाधिकार कानूनों के तहत गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है।
हाई कोर्ट की सख्ती: राज्य सरकार को नोटिस
पीड़ित परिवार की याचिका पर सुनवाई करते हुए बिलासपुर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि दो सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब पेश किया जाए। मामले की अगली सुनवाई जून के अंतिम सप्ताह में निर्धारित है।
मानवाधिकार संगठनों की नजर
यह मामला अब मानवाधिकार संगठनों और जन संगठनों के भी रडार पर है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह हत्या साबित होती है तो यह जेल प्रशासन की जिम्मेदारी तय करने और पुलिस हिरासत में पारदर्शिता लाने का एक महत्वपूर्ण अवसर होगा।
क्या कहता है कानून?
हिरासत में मौत (Custodial Death) को भारतीय संविधान और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों के तहत गंभीर उल्लंघन माना जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई निर्णयों में साफ किया है कि पुलिस या जेल में मौत की स्थिति में राज्य जिम्मेदार होता है और उसे मुआवजा व कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करनी होती है।
न्याय की आस में परिवार
नीरज भोई के परिवार ने उच्च न्यायालय से न्याय और दोषियों पर कठोर कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि यदि समय पर जांच और कार्रवाई न हुई, तो यह आदिवासी समुदाय के विश्वास को झकझोर देगा।



