
बिलासपुर न्यूज धमाका – छत्तीसगढ़ के शिक्षा क्षेत्र में एक बड़ी और ऐतिहासिक जीत दर्ज हुई है। बिलासपुर हाई कोर्ट के डिविज़न बेंच ने आरटीई (RTE) के तहत निष्कासित 74 विद्यार्थियों को पुनः विद्यालयों में दाखिला देने का आदेश पारित किया है। यह फैसला न केवल संविधान में निहित मौलिक अधिकारों की पुनः पुष्टि करता है, बल्कि राज्य में शिक्षा के अधिकार की रक्षा के लिए एक मिसाल बनकर सामने आया है।
कौन से स्कूलों को मिला आदेश?
- डीपीएस रिसाली
- शंकराचार्य विद्यालय सेक्टर-10, भिलाई
- डीएवी हुडको माइलस्टोन
इन तीनों स्कूलों से जुलाई 2025 में डीईओ, दुर्ग के आदेश पर आरटीई के तहत नामांकित 74 छात्रों को निष्कासित कर दिया गया था। यह कदम न केवल छात्रों के भविष्य के लिए घातक था, बल्कि शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 की भावना के भी खिलाफ था।
कोर्ट ने क्या कहा?
“शिक्षा प्रत्येक बच्चे का मौलिक अधिकार है। उसे परिस्थितियों के आधार पर छीना नहीं जा सकता।”
— बिलासपुर हाई कोर्ट डिविज़न बेंच
- डीईओ दुर्ग का आदेश अस्थायी रूप से निरस्त किया गया।
- स्कूलों को निर्देश: 74 छात्रों को तत्काल प्रभाव से पढ़ाई की अनुमति दी जाए।
- विद्यालयों पर यह ज़िम्मेदारी डाली गई कि वे बच्चों को वर्ष भर के लिए नियमित कक्षाओं में शामिल करें।
कानूनी लड़ाई में कौन-कौन रहा सक्रिय?
- सांसद विजय बघेल की पहल पर अभिभावकों ने कानूनी मोर्चा खोला
- वरिष्ठ अधिवक्ता टी.के. झा और सौरभ चौबे के नेतृत्व में वकीलों की टीम ने हाई कोर्ट में प्रभावी पैरवी की
- तर्क दिया गया कि बच्चों को स्कूल से निकालना संविधान के अनुच्छेद 21A (शिक्षा का अधिकार) का उल्लंघन है
बच्चों और अभिभावकों को राहत
इस निर्णय से:
- 74 बच्चों को पुनः विद्यालय में प्रवेश मिलेगा
- अभिभावकों की चिंता समाप्त हुई
- शिक्षा अधिकार अधिनियम की वैधानिकता को मजबूती मिली
पृष्ठभूमि: क्यों निकाले गए थे बच्चे?
- 3 जुलाई 2025 को जिला शिक्षा अधिकारी, दुर्ग ने तीनों स्कूलों को निर्देशित कर RTE के तहत पढ़ने वाले बच्चों को निष्कासित कर दिया था।
- कारणों में स्कूलों द्वारा RTE फंडिंग को लेकर प्रशासन से मतभेद बताए जा रहे थे।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
शिक्षा अधिकार कार्यकर्ता डॉ. नीरज वर्मा का कहना है:
“यह फैसला उन निजी स्कूलों के लिए चेतावनी है जो RTE को बोझ समझते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि संविधान के अधिकारों के साथ कोई समझौता नहीं होगा।”
निष्कर्ष
बिलासपुर हाई कोर्ट का यह फैसला केवल 74 बच्चों की जीत नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक संदेश है –
शिक्षा कोई रियायत नहीं, बल्कि हर बच्चे का हक है।



