
बलौदाबाजार न्यूज धमाका – सिमगा विकासखंड के ग्राम पंचायत चंडी में शुक्रवार को श्री सीमेंट प्लांट खपराडीह के खिलाफ ग्रामीणों ने जोरदार प्रदर्शन किया। ग्रामीणों का आरोप है कि प्लांट प्रबंधन ने पहले हुई बैठक में 15 दिन के भीतर समस्याओं के समाधान का वादा किया था, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। इससे नाराज होकर ग्रामीणों ने सात सूत्रीय मांगों को लेकर धरना शुरू किया है।

प्रमुख मांगें:
- स्थानीय बेरोजगारों को रोजगार में प्राथमिकता
- अधिग्रहीत आदिवासी भूमि का पुनः पंजीयन
- जलाशय क्षेत्र में अतिक्रमण की जांच
- विस्थापित परिवारों को स्थायी रोजगार
- ट्रक यार्ड और सड़क निर्माण के लिए ली गई जमीन की वापसी
- ग्राम विकास फंड की राशि का उपयोग
- शासकीय भूमि और सौर पैनल स्थानों से अतिक्रमण हटाना
ग्रामीणों का आरोप: “15 साल में नहीं हुआ कोई विकास”
प्रदर्शन में शामिल नवनिर्वाचित सरपंच सत्यभामा विनोद बंछोर ने बताया:
“प्लांट को स्थापित हुए 15 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन ग्राम चंडी का कोई विकास नहीं हुआ। शासकीय भूमि पर कब्जा कर लिया गया है, युवा बेरोजगार हैं और ग्रामवासी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं।”
ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि बांध क्षेत्र पर अतिक्रमण हुआ है और सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए चिन्हित जमीन पर प्लांट ने कब्जा कर लिया है। पानी और सड़क जैसी बुनियादी समस्याएं अब भी बनी हुई हैं।

प्रशासन ने ली पहल, वार्ता जारी
ग्रामीणों के आक्रोश को देखते हुए प्रशासन ने तत्काल पहल करते हुए एसडीएम सिमगा अंशुल वर्मा और अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अभिषेक सिंह को मौके पर भेजा। दोनों अधिकारियों की मौजूदगी में श्री सीमेंट प्रबंधन और ग्रामीण प्रतिनिधियों के बीच वार्ता जारी है।
प्रदर्शन हो सकता है और उग्र
ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर उचित कार्रवाई नहीं की गई, तो आंदोलन को और उग्र किया जाएगा। स्थिति को देखते हुए स्थानीय प्रशासन और पुलिस बल मौके पर मुस्तैद है।
समाधान या टकराव?
अब सभी की निगाहें इस वार्ता पर टिकी हैं — क्या श्री सीमेंट प्रबंधन ग्रामीणों की मांगों पर सकारात्मक रुख अपनाएगा? क्या प्रशासन मध्यस्थ की भूमिका निभाकर समाधान निकाल पाएगा? यदि नहीं, तो आने वाले दिनों में यह प्रदर्शन एक बड़े जनांदोलन का रूप भी ले सकता है।
निष्कर्ष:
ग्रामीणों के असंतोष का यह प्रदर्शन केवल एक कंपनी के खिलाफ विरोध नहीं, बल्कि यह उन वादों की जवाबदेही की मांग है, जो औद्योगिक विकास के नाम पर ग्रामीण जीवन को प्रभावित करते हैं। यह घटना प्रशासन, उद्योग और ग्रामीण समुदाय — तीनों के बीच संतुलन की जरूरत को रेखांकित करती है।



