
दंतेवाड़ा न्यूज धमाका – छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में नक्सल हिंसा से त्रस्त इलाकों में शांति और पुनर्वास की दिशा में चलाए जा रहे ‘लोन वर्राटू’ (घर वापसी) अभियान ने आज एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की। दंतेवाड़ा पुलिस के इस विशेष प्रयास के चलते अब तक 1005 माओवादी हिंसा का रास्ता छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौट चुके हैं।
आज के दिन इस अभियान के तहत 12 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, जिनमें 2 शीर्ष इनामी कमांडर और एक माओवादी दंपति भी शामिल हैं। इस उपलब्धि पर एसपी गौरव राय ने पुलिस बल और नागरिकों के साथ मिलकर केक काटकर खुशी जाहिर की।
आज आत्मसमर्पण करने वाले प्रमुख इनामी नक्सली
| नाम | पद | इनाम |
|---|---|---|
| चंद्रना | डीकेएसएम/पश्चिम बस्तर डिवीजन अध्यक्ष | ₹8 लाख |
| अमित उर्फ हिंगा बारसा | कंपनी नंबर 10 सदस्य (थाना जगरगुंडा) | ₹8 लाख |
| अरुणा | डीकेएसएम मेडिकल टीम सदस्य | ₹5 लाख |
| देवा कवासी | लाइन नंबर 32 कमांडर | ₹3 लाख |
| राजेश मड़काम | बीजापुर अध्यक्ष, डीकेएसएम | ₹2 लाख |
| पायके ओयाम | परिया कमेटी सदस्य | ₹1 लाख |
| कोसा सोढ़ी, महेश लेकाम, राजू करटाम | आरपीसी सदस्य | ₹50,000 प्रत्येक |
इनके अलावा हिड़मे कोवासी, जीबू उर्फ रोशन, और अनिल लेकाम जैसे निचले स्तर के 3 माओवादी कार्यकर्ताओं ने भी आत्मसमर्पण किया।
पुलिस और सुरक्षाबलों का अहम योगदान
इस अभियान को सफल बनाने में डीआरजी, बस्तर फाइटर्स, आसूचना शाखा, RFT, और सीआरपीएफ की 111वीं व 241वीं वाहिनी की अहम भूमिका रही। गुप्त जानकारियों और निरंतर प्रयासों से इन माओवादियों को मुख्यधारा में लौटने के लिए प्रेरित किया गया।
पुनर्वास और पुनर्निर्माण की दिशा में कदम
सरकार द्वारा आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों को:
- ₹50,000 तत्काल सहायता राशि
- स्किल डेवलपमेंट प्रशिक्षण
- कृषि भूमि
- और अन्य सरकारी पुनर्वास सुविधाएं प्रदान की जाएंगी।
‘लोन वर्राटू’ की शुरुआत और प्रगति
- जून 2020 में दंतेवाड़ा पुलिस द्वारा शुरू किया गया अभियान।
- लक्ष्य: माओवादियों को आत्मसमर्पण कराकर मुख्यधारा में लौटाना।
- अब तक थानावार माओवादी सूची, पोस्टर चस्पा, ग्राम पंचायतों में प्रचार, और निरंतर अपील के माध्यम से 1005 आत्मसमर्पण।
एसपी गौरव राय का बयान:
“यह नक्सलियों के खिलाफ सिर्फ ऑपरेशन नहीं, एक सामाजिक पुनर्निर्माण की प्रक्रिया है। हम हर उस हाथ को पकड़ेंगे, जो बंदूक छोड़कर कलम, हल और सम्मानजनक जीवन अपनाना चाहता है।”
निष्कर्ष:
‘लोन वर्राटू’ अब सिर्फ एक पुलिस अभियान नहीं, बल्कि शांति, पुनर्वास और पुनर्रचना की एक जनचेतना बन चुका है। यह मॉडल भविष्य में देश के अन्य नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के लिए एक प्रेरणा स्रोत बन सकता है।
