
21 सितम्बर 2026 //
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रिश्वत मामले में लेखापाल को बरी करते हुए कहा कि सिर्फ रकम बरामद होना पर्याप्त नहीं, अभियोजन को रिश्वत की मांग और स्वीकृति साबित करनी होगी।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार से जुड़े करीब एक दशक पुराने मामले में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ किया कि आरोपी के पास रिश्वत की रकम बरामद होना अपने आप में दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अभियोजन को यह स्थापित करना होगा कि आरोपी ने रिश्वत की मांग की और उसे स्वीकार भी किया था। मांग का ठोस प्रमाण नहीं होने पर केवल रकम बरामदगी के आधार पर सजा कायम नहीं रखी जा सकती।
यह फैसला न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकलपीठ ने 18 सितंबर को सुनाया। अदालत ने सूरजपुर विशेष न्यायालय के मार्च 2017 के उस फैसले को निरस्त कर दिया, जिसमें तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय के लेखापाल मुरली प्रसाद चौधरी को रिश्वत के मामले में दोषी ठहराया गया था।
8 हजार रुपए की रिश्वत का था आरोप
अभियोजन के अनुसार, मां सरस्वती शिक्षा समिति द्वारा संचालित स्कूल की मान्यता से जुड़े काम के लिए समिति के अध्यक्ष से पहले 15 हजार रुपए की मांग किए जाने का आरोप था। बाद में कथित रकम 8 हजार रुपए तय होने की बात सामने आई। शिकायत के बाद एंटी करप्शन ब्यूरो ने 30 जून 2014 को सूरजपुर स्थित DEO कार्यालय में ट्रैप की कार्रवाई की। अभियोजन का दावा था कि आरोपी ने 8 हजार रुपए स्वीकार किए और रकम उसकी जेब से बरामद हुई। रकम पर केमिकल परीक्षण में नोटों के संपर्क में आने की पुष्टि भी बताई गई, लेकिन ट्रायल के दौरान अभियोजन के लिए मामला कमजोर पड़ गया।
शिकायतकर्ता ने ही मांग से किया इनकार
सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता ने अदालत में कहा कि लेखापाल ने उससे रिश्वत की मांग नहीं की थी। एक अन्य गवाह ने भी कथित तौर पर यह बयान दिया कि शिकायतकर्ता ने पैसे जबरन आरोपी की जेब में डाल दिए थे। हाईकोर्ट ने इन बयानों को महत्वपूर्ण माना और कहा कि रिश्वत की मांग के मूल आरोप को किसी गवाह ने पुष्ट नहीं किया। अदालत ने माना कि ऐसी स्थिति में केवल आरोपी की जेब से रकम मिलना रिश्वत की मांग और स्वीकृति का निर्णायक सबूत नहीं माना जा सकता।
ऑडियो रिकॉर्डिंग पर भी उठे सवाल
अभियोजन ने कथित रिश्वत मांग को साबित करने के लिए बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग पर भी भरोसा किया था। लेकिन हाईकोर्ट ने इसकी प्रमाणिकता पर भी सवाल उठाए। अदालत के सामने यह बात आई कि रिकॉर्डिंग के संबंध में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत आवश्यक प्रमाणपत्र नहीं लिया गया था। इसके अलावा आरोपी की आवाज का नमूना लेने और रिकॉर्डिंग में मौजूद आवाज का फॉरेंसिक परीक्षण कराने की प्रक्रिया भी पूरी नहीं की गई थी। ऐसे में रिकॉर्डिंग को रिश्वत की मांग साबित करने वाला विश्वसनीय इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य नहीं माना गया।
2017 का फैसला रद्द, लेखापाल बरी
हाईकोर्ट ने कहा कि रिश्वत के मामले में मांग साबित होना अभियोजन के लिए बुनियादी आवश्यकता है। जब मांग और स्वीकार किए जाने का विश्वसनीय प्रमाण सामने नहीं आया, तो केवल रकम की बरामदगी और रासायनिक जांच के आधार पर दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती। इसी आधार पर कोर्ट ने विशेष अदालत के मार्च 2017 के फैसले को रद्द करते हुए तत्कालीन लेखापाल मुरली प्रसाद चौधरी को मामले में बरी कर दिया।



