
21 अगस्त 2026 //
खैरागढ़ न्यूज़ धमाका – खैरागढ़ शहर की आमनेर नदी और उसकी सहायक नदियां मुस्का और पिपरिया कभी शहर की जीवनरेखा हुआ करती थीं. तीनों का संगम खैरागढ़ शहर में होता है. लेकिन आज हालात बदल चुके हैं. सावन में बारिश के बावजूद कई हिस्सों में नदी का तल सूखा दिखाई दे रहा है. कहीं गंदगी और जलकुंभी है तो कहीं शहर की नालियों का पानी सीधे नदी में पहुंच रहा है. दूसरी ओर नदी के प्रवाह क्षेत्र में अतिक्रमण और नदी में सालों से जमा मिट्टी और कचरे की परत ने उसका दायरा और गहराई दोनों कम कर दी है. यह समस्या नई नहीं है. वर्ष 2022 में भी आमनेर-पिपरिया-मुस्का के सूखने और इसका असर भूजल स्तर पर पड़ने की रिपोर्ट सामने आ चुकी है, यानी पिछले कई वर्षों से चेतावनी मिल रही है, लेकिन स्थायी समाधान अब भी जमीन पर दिखाई नहीं दे रहा.
इस साल जिले में बारिश लगातार हुई है, लेकिन पिछले दो वर्षों में जैसी तीव्र बारिश नहीं हुई. जिला पंचायत CEO प्रेमकुमार पटेल के मुताबिक जिले में औसत बारिश करीब 80-90 प्रतिशत है और ऊपरी क्षेत्र के बांधों, खेतों में भी पर्याप्त पानी नहीं भर पाया है. इसका असर नदियों के बहाव पर पड़ा है. हालांकि नदी की मौजूदा हालत के पीछे सिर्फ बारिश कम होना ही कारण नहीं है. CEO खुद मानते हैं कि लंबे समय से शहर की नालियों का पानी सीधे नदी में जाना गंभीर समस्या है. उनका कहना है कि नालियों के पानी को सोखपीट या उपचार व्यवस्था से गुजरना चाहिए था, लेकिन कई जगह यह सीधे नदी में पहुंच रहा है. इससे नदी का प्राकृतिक जीवन खत्म होने की स्थिति बन रही है.
दूसरी बड़ी समस्या नदी का घटता दायरा है. निर्मल त्रिवेणी अभियान से जुड़े भागवत शरण सिंह के मुताबिक 2019 के बाद नदी का दायरा कम हुआ है और कई जगह नदी-नालों के भीतर तक निर्माण दिखाई देता है. नदी का रास्ता संकरा होने से सामान्य दिनों में पानी नहीं टिकेगा और तेज बारिश में पानी के बहाव के लिए पर्याप्त जगह भी नहीं बचेगी. यही स्थिति गंभीर रूप लेकर खैरागढ़ में बाढ़ के खतरे को भी बढ़ा सकती है.
स्थानीय निवासी मनोहर सेन बताते हैं कि जिस मुस्का नदी में पहले लोग नहाते-धोते थे, मवेशियों को पानी पिलाते थे और त्योहारों पर स्नान करते थे, आज उसी नदी में सावन के दौरान भी पानी नहीं है. विमल बोरकर का कहना है कि नदी में जलकुंभी और गंदगी जमा है और घरों से निकलने वाला मटमैला पानी सीधे नदी में जा रहा है. दोनों स्थानीय निवासी नदी के संरक्षण और अतिक्रमण हटाने की मांग कर रहे हैं.
नदी की बदहाली का असर सिर्फ पर्यावरण तक सीमित नहीं है. खैरागढ़ के भूजल पर भी इसका सीधा असर पड़ सकता है. बारिश का पानी नदी और उसके आसपास के जलागम क्षेत्र में टिकेगा और जमीन में उतरेगा, तभी भूजल रिचार्ज मजबूत होगा. नदी का रास्ता सिकुड़ने, पानी तेजी से निकल जाने और जल संरचनाओं की क्षमता कमजोर होने से यह प्राकृतिक रिचार्ज व्यवस्था भी प्रभावित होती है. 2022 की रिपोर्ट में भी आमनेर-पिपरिया-मुस्का के सूखने के साथ भूजल स्तर और पेयजल संकट पर असर की बात सामने आई थी. अब प्रशासन उद्गम क्षेत्र से समाधान की तैयारी की बात कर रहा है.
लमती योजना से भी नदी के प्रवाह को बढ़ाने की उम्मीद
जिला पंचायत CEO के मुताबिक आमनेर, मुस्का और पिपरिया के उद्गम क्षेत्रों में जल संरक्षण के काम कराने का प्रयास होगा. पिपरिया में एनीकट और पाइपलाइन से जुड़े काम प्रस्तावित हैं. भविष्य की लमती योजना से भी नदी के प्रवाह को बढ़ाने की उम्मीद जताई गई है. शहर के गंदे पानी के लिए STP यानी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट प्रस्तावित है. नगरपालिका स्तर पर इसके लिए जमीन का प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है. STP बनने के बाद शहर के सीवेज को उपचारित कर नदी में जाने से पहले नियंत्रित करने की व्यवस्था हो सकेगी. लेकिन असली सवाल यही है कि STP बनने तक नदी में जा रहे गंदे पानी का क्या होगा और नदी की जमीन पर हो रहे अतिक्रमण को कब रोका जाएगा?
सिर्फ सफाई अभियान नहीं, व्यापक कार्ययोजना से बचेगी नदियां
खैरागढ़ की तीनों नदियों को बचाने के लिए अब सिर्फ सफाई अभियान पर्याप्त नहीं होगा. उद्गम से संगम तक नदी का सर्वे, पुराने और वर्तमान प्रवाह क्षेत्र की पहचान, अतिक्रमण का सीमांकन, गाद की सफाई, नालियों के सभी आउटलेट की पहचान और सीवेज को नदी से अलग करने की समयबद्ध योजना जरूरी है. क्योंकि मामला सिर्फ आज नदी में पानी होने या न होने का नहीं है. अगर आमनेर, मुस्का और पिपरिया की जलधारा कमजोर होती गई तो इसका असर खैरागढ़ के भूजल, पेयजल व्यवस्था और आने वाली पीढ़ियों की जल सुरक्षा पर पड़ेगा. आज नदी का दायरा बचाना जरूरी है, वरना कल खैरागढ़ के पास पानी बचाना बड़ी चुनौती बन सकता है.



