
21 अगस्त 2026 //
बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक या नियंत्रण की मांग वाली जनहित याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को प्रतिबंधित या नियंत्रित करने का मामला नीतिगत विषय है और इस पर फैसला लेना केन्द्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अदालत सरकार को इस संबंध में कोई नीति बनाने या सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर रोक लगाने का निर्देश नहीं दे सकती। पीठ ने कहा कि इस तरह के मामलों में सरकार को सभी पहलुओं पर विचार करते हुए उचित फैसला लेना चाहिए।
स्टिस वी. कामेश्वर राव और जस्टिस मनमीत पीएस अरोड़ा की पीठ ने याचिका को केन्द्र सरकार के समक्ष एक आवेदन के तौर पर देखने का निर्देश दिया। सुनवाई के दौरान पीठ ने स्पष्ट किया कि बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने या उसके इस्तेमाल को नियंत्रित करने का निर्देश देना अदालत का काम नहीं है। अदालत ने कहा कि यह नीतिगत विषय है और इस पर फैसला सरकार को लेना होगा। पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा कि वह केन्द्र सरकार को इस मामले पर विचार करने का अवसर दें। अदालत ने अधिकारियों को इस संबंध में उचित आदेश पारित करने को कहा, लेकिन इसके लिए कोई निश्चित समयसीमा तय करने से इनकार कर दिया
जनहित याचिका में की गई थीं ये मांगें
जनहित याचिका में याचिकाकर्ता ने दिल्ली हाई कोर्ट से केन्द्र सरकार को 13 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए कानून या गाइडलाइन तैयार करने पर विचार करने का निर्देश देने की मांग की थी। याचिका में बच्चों को सोशल मीडिया के संभावित दुष्प्रभावों से बचाने के लिए उम्र के आधार पर अलग-अलग नियम लागू करने की बात कही गई थी। इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने 13 से 16 साल की उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया कंटेंट को नियंत्रित करने की एक रूपरेखा तैयार करने की मांग की थी।
नया कानून बनाने की जरूरत पड़ सकती है’
सुनवाई के दौरान केन्द्र सरकार की ओर से पेश वकील निधि रमन ने कहा कि बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने या उसे नियंत्रित करने का मुद्दा केन्द्र सरकार के स्तर पर विचार का विषय है। उन्होंने कहा कि इस तरह के प्रावधान लागू करने के लिए नया कानून बनाने की जरूरत पड़ सकती है। निधि रमन ने अदालत को बताया कि सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर किसी भी तरह की पाबंदी या नियमन का व्यापक प्रभाव हो सकता है। ऐसे में कोई भी फैसला लेने से पहले संबंधित हितधारकों से व्यापक विचार-विमर्श करना जरूरी होगा। केन्द्र की ओर से यह भी कहा गया कि याचिकाकर्ता की मांग को सरकार के समक्ष अभ्यावेदन के तौर पर लिया जा सकता है।
व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम का भी दिया गया हवाला
सुनवाई के दौरान पीठ ने केन्द्र सरकार की वकील से पूछा कि क्या इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेश के बाद कोई कदम उठाया गया है। इसके जवाब में सरकार की ओर से बताया गया कि डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम बनाया जा चुका है। यह कानून बच्चों की ऑनलाइन निजता की सुरक्षा से जुड़े प्रावधान भी करता है। वहीं, याचिकाकर्ता के वकील ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर चाइल्ड सेक्सुअल अब्यूज मटीरियल (CSAM) की मौजूदगी को लेकर चिंता जताई। उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि केन्द्र सरकार को याचिका में उठाए गए मुद्दों पर तय समय के भीतर फैसला लेने का निर्देश दिया जाए।
मेटा ने CSAM कंटेंट हटाने के लिए उठाए कदम, कोर्ट को दी जानकारी
सुनवाई के दौरान मेटा प्लेटफॉर्म की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने दिल्ली हाई कोर्ट को भरोसा दिलाया कि कंपनी अपने प्लेटफॉर्म पर चाइल्ड सेक्सुअल अब्यूज मटीरियल (CSAM) को नियंत्रित करने के लिए लगातार कदम उठा रही है। अदालत को बताया गया कि पिछले साल फेसबुक से CSAM से जुड़े करीब 6 लाख पोस्ट हटाए गए, जबकि इंस्टाग्राम से ऐसे करीब 2 लाख पोस्ट हटाए गए। मेटा की ओर से कहा गया कि प्लेटफॉर्म पर इस तरह के आपत्तिजनक कंटेंट की पहचान और उसे हटाने के लिए आवश्यक कार्रवाई की जा रही है।