छतीसगढ़गरियाबंद

05 जून 2026 // पर्यावरण दिवस पर विशेष :  84 गांवों का ‘अलिखित कानून’, जिसने सदियों से बचाए रखा जंगल और पहाड़

गरियाबंद न्यूज़ धमाका – रायपुर से करीब 220 किलोमीटर दूर अमलीपदर क्षेत्र के ग्राम गुढियारी में स्थित कांडाडोंगर पहाड़ी, गरियाबंद जिले के ओडिशा सीमा से लगी है।

गरियाबंद के अमलीपदर से रायपुर से करीब 220 किलोमीटर दूर अमलीपदर क्षेत्र के ग्राम गुढियारी में स्थित कांडाडोंगर पहाड़ी, गरियाबंद जिले के ओडिशा सीमा से लगी है। घने जंगलों से घिरी यह पहाड़ी आसपास के 84 गांवों के लाखों लोगों की आस्था का केंद्र है। कांडाडोंगर अंचल के पहाड़ी को देवस्थल और जंगलों को अपने पुरखों की जीवित वसीयत मानकर पूज रहे हैं। यहां के लोगों के लिए प्रकृति ही देव है। 

प्रकृति ही आस्था का केंद्र। प्रकृति और देवता के बीच कोई लकीर नहीं है। जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं बल्कि देवताओं का वास है, पहाड़ केवल पत्थरों का समूह नहीं, बल्कि आस्था शिखर है। जलस्रोत पानी नहीं, बल्कि जीवन की धारा हैं। लोग जंगलों को बचाना अपना संवैधानिक कर्तव्य नहीं, बल्कि अपना मूल धर्म मानते हैं।

सदियों पुरानी वो ‘देवसभा’, जिसने थाम लिया मानव-वन्यजीव संघर्ष
स्थानीय लोक श्रुतियों के अनुसार, प्राचीन समय में इस अंचल में भीषण सूखा, महामारी और हिंसक जंगली जानवरों का आतंक बढ़ गया था। तब संकट से मुक्ति के लिए आसपास के 84 गांवों के देवी-देवताओं को कांडाडोंगर की इसी पहाड़ी पर आमंत्रित किया गया था। तब एक ऐतिहासिक ‘देवसभा हुई और सबने मिलकर क्षेत्र की रक्षा का संकल्प लिया। उसी घटना की स्मृति में आज भी प्रतिवर्ष ‘देव दशहरा महोत्सव’ आयोजित होता है, जिसमें 84 गांवों के देवी-देवता अपने पारंपरिक निशानों के साथ शामिल होते हैं। इसी सह-अस्तित्व की संस्कृति का असर है कि आज भी इस घने जंगल में वन्यजीवों की भारी मौजूदगी के बावजूद इंसानों और जानवरों के बीच कभी कोई खूनी संघर्ष नहीं होता।

खम्भेश्वरी माताः पेड़ की टहनी नहीं, साक्षात प्रकृति का स्वरूप
कांडाडोंगर की सबसे अनूठी परंपरा खम्मेश्वरी माता की पूजा है। यहां किसी पत्थर या धातु की मूर्ति की पूजा नहीं होती। भुजिया जनजाति के पारंपरिक पुजारी जंगल से लाए गए एक विशेष वृक्ष के ‘लकड़ी के खंभे को पहाड़ी पर स्थापित करते हैं। इसी काष्ठ-स्तंभ को खम्भेश्वरी माता का स्वरूप मानकर शीश नवाया जाता है। श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास है कि इस खंभे में वास करने वाली शक्तियां ही समय पर पानी बरसाती है, जंगलों को हरा-भरा रखती हैं और क्षेत्र को हर प्राकृतिक आपदा से बचाती हैं।

कांडाडोंगर हमारे पूर्वजों की विरासत
कांडाडोंगर पहाड़ीपू र्व विधायक एवं पूर्व मुख्य पुजारी डमरूधर पुजारी ने बताया कि, कांडाडोंगर हमारे पूर्वजों की विरासत और अटूट आस्था का केंद्र है। यह पावन देवस्थल सदियों से लोगों को केवल सुख-शांति का आशीर्वाद ही नहीं दे रहा, बल्कि आधुनिक इंसानों को यह कड़ा संदेश भी दे रहा है कि यदि प्रकृति सुरक्षित रहेगी, तभी हमारा और हमारी आने वाली नस्लों का भविष्य सुरक्षित रहेगा।

यह सीख सकते हैं
आज पर्यावरण को बचाने के लिए देश-दुनिया में सैकड़ों कानून और ट्रिब्यूनल बने हुए हैं, लेकिन कागजों पर बने इन नियमों के बावजूद जंगल लगातार सिकुड़ रहे हैं। कांडाडोंगर की यह जीवंत परंपरा बताती है कि पर्यावरण संरक्षण का सबसे मजबूत आधार अदालत का डंडा या कानून की धाराएं नहीं, बल्कि समाज की आंतरिक चेतना, श्रद्धा और प्रकृति के प्रति भावनात्मक जुड़ाव है। पर्यावरण दिवस पर यह पहाड़ी संदेश दे रही है कि पौधा लगाना सिर्फ एक दिन का रस्म नहीं, उसे भगवान मानकर पालना असली सस्टेनेबिलिटी है।

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Chhattisgarh News Dhamaka Team

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